देश की राजनीति में जवाबदेही और पारदर्शिता लाने के मसले पर लंबे समय से बहस चलती रही है, लेकिन अब तक कोई ऐसा खाका सामने नहीं आ सका है, ताकि सिर्फ स्वच्छ छवि के लोगों को ही जनप्रतिनिधि बनने का अवसर मिले। आए दिन संसद और विधानसभाओं में आपराधिक पृष्ठभूमि से आने के बावजूद चुने गए जनप्रतिनिधियों की बढ़ती संख्या को लेकर चिंता तो जताई जाती है, मगर उसके हल को लेकर कोई ठोस पहल नहीं होती। संविधान के तहत केवल दोषी ठहराए गए जनप्रतिनिधियों को ही पद से हटाया जा सकता है और इस संबंध में संवैधानिक पद पर बैठे नेताओं को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
इसी संदर्भ में केंद्र सरकार फिर से एक सौ तीसवें संविधान संशोधन विधेयक को संसद में पेश कर सकती है, जिसके तहत प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या अन्य मंत्रियों को पांच साल से ज्यादा सजा के प्रावधान वाले गंभीर अपराधों के लिए गिरफ्तार किए जाने और लगातार तीस दिनों तक हिरासत में रखे जाने पर पद से हटाने का प्रस्ताव है। अगर विधेयक की जांच के बाद संयुक्त संसदीय समिति इसे अपनी मंजूरी दे देती है, तो संसद के मानसून सत्र में इस पर बहस की संभावना है।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष अगस्त में केंद्रीय गृहमंत्री ने संसद में यह विधेयक पेश किया था। हालांकि, विपक्षी दलों की ओर से उठाई गई कई आपत्तियों के बाद इसकी जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया गया था, लेकिन कांग्रेस सहित ज्यादातर विपक्षी दलों ने अपनी चिंताओं को नजरअंदाज किए जाने की आशंका के मद्देनजर समिति का बहिष्कार कर दिया था।
इसमें कोई दोराय नहीं कि भारतीय राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का बढ़ता दखल आज एक गंभीर समस्या बन चुका है। मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत तकनीकी जटिलताओं का लाभ उठाकर कई बार ऐसे लोग भी चुनकर संसद या विधानसभाओं में आ जाते हैं, जिन पर जघन्य अपराधों में शामिल होने का आरोप होता है। अक्सर सामने आने वाली रिपोर्ट में खासी संख्या में दागी जनप्रतिनिधियों के विधायिका में पहुंचने का ब्योरा होता है, जिस पर सभी दल चिंता जताते हैं, लेकिन ऐसे लोगों को टिकट न देने को लेकर किसी के भीतर कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखती। दूसरी ओर, चुनाव आयोग भी इस मसले पर कोई स्पष्ट रुख अख्तियार नहीं करता है।
इस लिहाज से देखें, तो सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही बढ़ाने से लेकर लोकतंत्र में नैतिकता और शुचिता सुनिश्चित किए जाने के लिए एक सख्त नियमन वक्त की जरूरत है। मगर यह ध्यान रखने की जरूरत है कि नया कानून देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर विपरीत प्रभाव डालने वाला न हो। दरअसल, विपक्षी दलों की ओर से प्रस्तावित कानून के प्रावधानों को अलोकतांत्रिक और संघीय ढांचे तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताया जा रहा है, जिसमें किसी आरोप के बाद दोषसिद्धि के बजाय सिर्फ हिरासत के आधार पर दंडित किए जाने की व्यवस्था है।
आशंका यह जताई जा रही है कि सत्ताधारी दल की ओर से जांच एजेंसियों का बेजा इस्तेमाल करके राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार कराया जा सकता है। ऐसे में चुनी हुई सरकारों के सामने भी अस्थिरता का संकट पैदा हो सकता है। जाहिर है, देश की राजनीति को आपराधिक छवि के लोगों से मुक्त करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए जो कानून बने, उसमें अपराधों की प्रकृति स्पष्ट किए जाने से लेकर ऐसे सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाने की जरूरत है, ताकि महज बदले या किसी सरकार को अस्थिर करने की मंशा से इसका दुरुपयोग न हो सके।






